भगवद्गीता · अध्याय 5 / 18
कर्मसंन्यासयोग — कर्म-संन्यास योग
29 श्लोक
अध्याय का सार
अर्जुन पूछते हैं कि कर्म का त्याग श्रेष्ठ है या कर्मयोग। कृष्ण कहते हैं कि दोनों एक ही लक्ष्य तक ले जाते हैं, पर कर्मयोग अधिक सरल है। ज्ञानी सबमें समान दृष्टि रखता है और भीतर की शांति में स्थित रहता है।
सभी 29 श्लोक
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5.1 · अर्जुन
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥saṃnyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi |
yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam ||अर्जुन बोले: हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से श्रेष्ठ हो, वह मुझे बताइए।
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5.2 · श्रीकृष्ण
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥saṃnyāsaḥ karmayogaśca niḥśreyasakarāvubhau |
tayostu karmasaṃnyāsātkarmayogo viśiṣyate ||श्रीभगवान बोले: कर्मों का संन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण की ओर ले जाते हैं। पर इन दोनों में कर्म-संन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
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5.3 · श्रीकृष्ण
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate ||हे महाबाहो, जो न किसी से द्वेष करता है और न कुछ चाहता है, उसे सदा संन्यासी ही जानो; क्योंकि द्वन्द्वों से मुक्त व्यक्ति सहज ही बंधन से छूट जाता है।
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5.4 · श्रीकृष्ण
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥sāṃkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ |
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||सांख्य और योग को नासमझ लोग अलग-अलग बताते हैं, ज्ञानी नहीं। इनमें से किसी एक में भी भली-भाँति स्थित व्यक्ति दोनों का फल पा लेता है।
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5.5 · श्रीकृष्ण
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति ॥yatsāṃkhyaiḥ prāpyate sthānaṃ tadyogairapi gamyate |
ekaṃ sāṃkhyaṃ ca yogaṃ ca yaḥ paśyati sa: paśyati ||जो पद सांख्य के मार्ग वाले पाते हैं, वही योग के मार्ग वाले भी पाते हैं। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही सचमुच देखता है।
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5.6 · श्रीकृष्ण
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ |
yogayukto munirbrahma nacireṇādhigacchati ||पर हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास को पाना कठिन है। योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त होता है।
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5.7 · श्रीकृष्ण
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ |
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate ||जो योग से युक्त है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा बन गई है, वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
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5.8 · श्रीकृष्ण
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥naiva kiṃcitkaromīti yukto manyeta tattvavit |
paśyañśrṛṇvanspṛśañjighrannaśnangacchansvapañśvasan ||तत्त्व को जानने वाला योगी देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, चलते, सोते और साँस लेते हुए भी यही मानता है कि “मैं कुछ भी नहीं करता” —
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5.9 · श्रीकृष्ण
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi |
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||— बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और मूँदते हुए भी वह यही समझता है कि इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं।
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5.10 · श्रीकृष्ण
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā ||जो आसक्ति छोड़कर, सब कर्म ब्रह्म को अर्पित करके कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से।
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5.11 · श्रीकृष्ण
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi |
yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhaye ||योगी आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धि के लिए शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते हैं।
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5.12 · श्रीकृष्ण
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥yuktaḥ karmaphalaṃ tyaktvā śāntimāpnoti naiṣṭhikīm |
ayuktaḥ kāmakāreṇa phale sakto nibadhyate ||योग से युक्त व्यक्ति कर्म के फल को त्यागकर स्थायी शांति पाता है; पर जो योग से युक्त नहीं, वह कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।
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5.13 · श्रीकृष्ण
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī |
navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan ||संयमी देहधारी मन से सब कर्मों को त्यागकर नौ द्वारों वाले नगर (शरीर) में सुख से रहता है — न स्वयं कुछ करता है, न किसी से कुछ करवाता है।
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5.14 · श्रीकृष्ण
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥na kartṛtvaṃ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ |
na karmaphalasaṃyogaṃ svabhāvastu pravartate ||प्रभु (आत्मा) संसार के लिए न कर्तापन रचता है, न कर्म, न कर्म और फल का संयोग। यह सब स्वभाव (प्रकृति) से ही चलता है।
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5.15 · श्रीकृष्ण
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥nādatte kasyacitpāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ |
ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||सर्वव्यापी प्रभु किसी का न पाप ग्रहण करता है, न पुण्य। ज्ञान अज्ञान से ढका है, इसीलिए प्राणी मोहित होते हैं।
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5.16 · श्रीकृष्ण
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥jñānena tu tadajñānaṃ yeṣāṃ nāśitamātmanaḥ |
teṣāmādityavajjñānaṃ prakāśayati tatparam ||पर जिनका अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य की तरह उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है।
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5.17 · श्रीकृष्ण
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ |
gacchantyapunarāvṛttiṃ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ ||जिनकी बुद्धि उसी में लगी है, जिनका मन उसी में है, जो उसी में निष्ठा रखते हैं और उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान से पाप धुल जाने पर ऐसी अवस्था पाते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।
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5.18 · श्रीकृष्ण
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥vidyāvinayasampanne brāhmaṇe gavi hastini |
śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ ||ज्ञानी विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और कुत्ते का मांस खाने वाले में भी समान दृष्टि रखते हैं।
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5.19 · श्रीकृष्ण
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ |
nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥ ||जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं, इसी जीवन में संसार को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
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5.20 · श्रीकृष्ण
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥na prahṛṣyetpriyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam |
sthirabuddhirasaṃmūḍho brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ ||जो प्रिय पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोह से मुक्त है, वह ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में स्थित है।
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5.21 · श्रीकृष्ण
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत् सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yat sukham |
sa brahmayogayuktātmā sukhamakṣayamaśnute ||जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं, वह आत्मा में ही सुख पाता है। ब्रह्म के योग में लगा हुआ वह अक्षय सुख का अनुभव करता है।
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5.22 · श्रीकृष्ण
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te |
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के विषयों के संपर्क से मिलने वाले भोग वास्तव में दुःख के ही स्रोत हैं; उनका आदि भी है और अंत भी। ज्ञानी उनमें नहीं रमता।
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5.23 · श्रीकृष्ण
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt |
kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||जो इस शरीर को छोड़ने से पहले यहीं काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है, वही सुखी मनुष्य है।
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5.24 · श्रीकृष्ण
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥yo’ntaḥsukho’ntarārāmastathāntarjyotireva yaḥ |
sa yogī brahmanirvāṇaṃ brahmabhūto’dhigacchati ||जो भीतर ही सुख पाता है, भीतर ही रमता है और जिसके भीतर ही प्रकाश है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।
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5.25 · श्रीकृष्ण
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥labhante brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ |
chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ ||जिनके पाप मिट गए हैं, जिनके संशय कट गए हैं, जिन्होंने अपने मन को वश में किया है और जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं।
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5.26 · श्रीकृष्ण
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥kāmakrodhaviyuktānāṃ yatīnāṃ yatacetasām |
abhito brahmanirvāṇaṃ vartate viditātmanām ||जो काम और क्रोध से मुक्त हैं, जिन्होंने चित्त को वश में किया है और आत्मा को जान लिया है, ऐसे यतियों के लिए ब्रह्मनिर्वाण सब ओर से निकट है।
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5.27 · श्रीकृष्ण
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥sparśānkṛtvā bahirbāhyāṃścakṣuścaivāntare bhruvoḥ |
prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau ||बाहरी विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, नासिका में चलने वाली प्राण और अपान वायु को सम करके —
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5.28 · श्रीकृष्ण
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||— जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही लक्ष्य मानता है और इच्छा, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।
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5.29 · श्रीकृष्ण
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥bhoktāraṃ yajñatapasāṃ sarvalokamaheśvaram |
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntimṛcchati ||मुझे यज्ञों और तपों का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर और सब प्राणियों का सुहृद (निःस्वार्थ मित्र) जानकर मनुष्य शांति पाता है।