भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 19 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.19 · इहैव तैर्जितः सर्गो मनः
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ |
nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं, इसी जीवन में संसार को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.19 का अर्थ क्या है?
जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं, इसी जीवन में संसार को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
भगवद्गीता 5.19 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।