भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 27 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.27 · स्पर्शान्कृत्वा भ्रुवोः
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥
sparśānkṛtvā bahirbāhyāṃścakṣuścaivāntare bhruvoḥ |
prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau ||
हिन्दी अनुवाद
बाहरी विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, नासिका में चलने वाली प्राण और अपान वायु को सम करके —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.27 का अर्थ क्या है?
बाहरी विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, नासिका में चलने वाली प्राण और अपान वायु को सम करके —
भगवद्गीता 5.27 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।