भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.6 · संन्यासस्तु महाबाहो
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ |
yogayukto munirbrahma nacireṇādhigacchati ||
हिन्दी अनुवाद
पर हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास को पाना कठिन है। योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.6 का अर्थ क्या है?
पर हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास को पाना कठिन है। योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त होता है।
भगवद्गीता 5.6 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।