भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.20 · न प्रहृष्येत्प्रियं

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥

na prahṛṣyetpriyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam |
sthirabuddhirasaṃmūḍho brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो प्रिय पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोह से मुक्त है, वह ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में स्थित है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.20 का अर्थ क्या है?

जो प्रिय पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोह से मुक्त है, वह ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में स्थित है।

भगवद्गीता 5.20 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।