भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 10 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.10 · ब्रह्मण्याधाय कर्माणि यः

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā ||

हिन्दी अनुवाद

जो आसक्ति छोड़कर, सब कर्म ब्रह्म को अर्पित करके कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.10 का अर्थ क्या है?

जो आसक्ति छोड़कर, सब कर्म ब्रह्म को अर्पित करके कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से।

भगवद्गीता 5.10 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।