भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 11 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.11 · कायेन मनसा बुद्ध्या
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi |
yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātmaśuddhaye ||
हिन्दी अनुवाद
योगी आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धि के लिए शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.11 का अर्थ क्या है?
योगी आसक्ति छोड़कर आत्मशुद्धि के लिए शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों से भी कर्म करते हैं।
भगवद्गीता 5.11 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।