भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 28 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.28 · यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥

yatendriyamanobuddhirmunirmokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||

हिन्दी अनुवाद

— जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही लक्ष्य मानता है और इच्छा, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.28 का अर्थ क्या है?

— जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही लक्ष्य मानता है और इच्छा, भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।

भगवद्गीता 5.28 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।