भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 21 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.21 · बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत् सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yat sukham |
sa brahmayogayuktātmā sukhamakṣayamaśnute ||
हिन्दी अनुवाद
जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं, वह आत्मा में ही सुख पाता है। ब्रह्म के योग में लगा हुआ वह अक्षय सुख का अनुभव करता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.21 का अर्थ क्या है?
जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं, वह आत्मा में ही सुख पाता है। ब्रह्म के योग में लगा हुआ वह अक्षय सुख का अनुभव करता है।
भगवद्गीता 5.21 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।