भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.15 · नादत्ते कस्यचित्पापं न
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥
nādatte kasyacitpāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ |
ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
सर्वव्यापी प्रभु किसी का न पाप ग्रहण करता है, न पुण्य। ज्ञान अज्ञान से ढका है, इसीलिए प्राणी मोहित होते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.15 का अर्थ क्या है?
सर्वव्यापी प्रभु किसी का न पाप ग्रहण करता है, न पुण्य। ज्ञान अज्ञान से ढका है, इसीलिए प्राणी मोहित होते हैं।
भगवद्गीता 5.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।