भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.5 · यत्सांख्यैः प्राप्यते
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति ॥
yatsāṃkhyaiḥ prāpyate sthānaṃ tadyogairapi gamyate |
ekaṃ sāṃkhyaṃ ca yogaṃ ca yaḥ paśyati sa: paśyati ||
हिन्दी अनुवाद
जो पद सांख्य के मार्ग वाले पाते हैं, वही योग के मार्ग वाले भी पाते हैं। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही सचमुच देखता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.5 का अर्थ क्या है?
जो पद सांख्य के मार्ग वाले पाते हैं, वही योग के मार्ग वाले भी पाते हैं। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही सचमुच देखता है।
भगवद्गीता 5.5 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।