भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 24 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.24 · योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

yo’ntaḥsukho’ntarārāmastathāntarjyotireva yaḥ |
sa yogī brahmanirvāṇaṃ brahmabhūto’dhigacchati ||

हिन्दी अनुवाद

जो भीतर ही सुख पाता है, भीतर ही रमता है और जिसके भीतर ही प्रकाश है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.24 का अर्थ क्या है?

जो भीतर ही सुख पाता है, भीतर ही रमता है और जिसके भीतर ही प्रकाश है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त होता है।

भगवद्गीता 5.24 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।