भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 13 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.13 · सर्वकर्माणि मनसा सुखं

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥

sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī |
navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan ||

हिन्दी अनुवाद

संयमी देहधारी मन से सब कर्मों को त्यागकर नौ द्वारों वाले नगर (शरीर) में सुख से रहता है — न स्वयं कुछ करता है, न किसी से कुछ करवाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.13 का अर्थ क्या है?

संयमी देहधारी मन से सब कर्मों को त्यागकर नौ द्वारों वाले नगर (शरीर) में सुख से रहता है — न स्वयं कुछ करता है, न किसी से कुछ करवाता है।

भगवद्गीता 5.13 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।