भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 23 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.23 · शक्नोतीहैव यः सोढुं

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimokṣaṇāt |
kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो इस शरीर को छोड़ने से पहले यहीं काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है, वही सुखी मनुष्य है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.23 का अर्थ क्या है?

जो इस शरीर को छोड़ने से पहले यहीं काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सहने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है, वही सुखी मनुष्य है।

भगवद्गीता 5.23 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।