भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.7 · योगयुक्तो विशुद्धात्मा
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ |
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyate ||
हिन्दी अनुवाद
जो योग से युक्त है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा बन गई है, वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.7 का अर्थ क्या है?
जो योग से युक्त है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा बन गई है, वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
भगवद्गीता 5.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।