भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.3 · ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी न
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate ||
हिन्दी अनुवाद
हे महाबाहो, जो न किसी से द्वेष करता है और न कुछ चाहता है, उसे सदा संन्यासी ही जानो; क्योंकि द्वन्द्वों से मुक्त व्यक्ति सहज ही बंधन से छूट जाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.3 का अर्थ क्या है?
हे महाबाहो, जो न किसी से द्वेष करता है और न कुछ चाहता है, उसे सदा संन्यासी ही जानो; क्योंकि द्वन्द्वों से मुक्त व्यक्ति सहज ही बंधन से छूट जाता है।
भगवद्गीता 5.3 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।