भगवद्गीता · अध्याय 11 / 18

विश्वरूपदर्शनयोग — विश्वरूप दर्शन योग

55 श्लोक

अध्याय का सार

अर्जुन की प्रार्थना पर कृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि देकर अपना विराट विश्वरूप दिखाते हैं — अनंत मुख, अनंत नेत्र और सब कुछ निगलता हुआ काल। भयभीत अर्जुन स्तुति करते हैं, और कृष्ण फिर से अपना सौम्य रूप धारण करते हैं।

सभी 55 श्लोक

  1. 11.1 · अर्जुन

    मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
    यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥

    madanugrahāya paramaṃ guhyamadhyātmasaṃjñitam |
    yattvayoktaṃ vacastena moho’yaṃ vigato mama ||

    अर्जुन बोले: मुझ पर अनुग्रह करके आपने आत्म-तत्त्व के विषय में जो परम गोपनीय उपदेश दिया है, उन वचनों से मेरा मोह दूर हो गया है।

  2. 11.2 · अर्जुन

    भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
    त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥

    bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā |
    tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam ||

    हे कमलनयन, मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश के बारे में विस्तार से सुना है, और आपकी अविनाशी महिमा के बारे में भी।

  3. 11.3 · अर्जुन

    एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
    द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥

    evametadyathāttha tvamātmānaṃ parameśvara |
    draṣṭumicchāmi te rūpamaiśvaraṃ puruṣottama ||

    हे परमेश्वर, आप अपने विषय में जैसा कहते हैं, वैसा ही है। फिर भी, हे पुरुषोत्तम, मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ।

  4. 11.4 · अर्जुन

    मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
    योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥

    manyase yadi tacchakyaṃ mayā draṣṭumiti prabho |
    yogeśvara tato me tvaṃ darśayātmānamavyayam ||

    हे प्रभु, यदि आप मानते हैं कि मैं उसे देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप के दर्शन कराइए।

  5. 11.5 · श्रीकृष्ण

    पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
    नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥

    paśya me pārtha rūpāṇi śataśo’tha sahasraśaḥ |
    nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca ||

    श्रीभगवान बोले: हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखो — दिव्य, अनेक प्रकार के, अनेक रंगों और आकृतियों वाले।

  6. 11.6 · श्रीकृष्ण

    पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
    बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥

    paśyādityānvasūnrudrānaśvinau marutastathā |
    bahūnyadṛṣṭapūrvāṇi paśyāścaryāṇi bhārata ||

    हे भारत, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखो। ऐसे अनेक आश्चर्य देखो जो पहले कभी किसी ने नहीं देखे।

  7. 11.7 · श्रीकृष्ण

    इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
    मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥

    ihaikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ paśyādya sacarācaram |
    mama dehe guḍākeśa yaccānyad draṣṭumicchasi ||

    हे गुडाकेश, आज यहीं मेरे शरीर में एक स्थान पर समाया हुआ सम्पूर्ण चर-अचर जगत देखो, और जो कुछ भी तुम देखना चाहो, वह भी।

  8. 11.8 · श्रीकृष्ण

    न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
    दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

    na tu māṃ śakyase draṣṭumanenaiva svacakṣuṣā |
    divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogamaiśvaram ||

    परन्तु अपनी इन आँखों से तुम मुझे नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ — मेरी ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो।

  9. 11.9 · संजय

    एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
    दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥

    evamuktvā tato rājanmahāyogeśvaro hariḥ |
    darśayāmāsa pārthāya paramaṃ rūpamaiśvaram ||

    संजय बोले: हे राजन, ऐसा कहकर महायोगेश्वर हरि ने तब पार्थ को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया —

  10. 11.10 · संजय

    अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
    अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥

    anekavaktranayanamanekādbhutadarśanam |
    anekadivyābharaṇaṃ divyānekodyatāyudham ||

    — जिसमें अनगिनत मुख और नेत्र थे, अनगिनत अद्भुत दृश्य थे, अनगिनत दिव्य आभूषण थे और अनगिनत उठे हुए दिव्य शस्त्र थे —

  11. 11.11 · संजय

    दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
    सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥

    divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam |
    sarvāścaryamayaṃ devamanantaṃ viśvatomukham ||

    — जो दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण किए था, दिव्य सुगन्धों से अनुलिप्त था; वह सब आश्चर्यों से भरा, अनन्त, सब ओर मुख वाला परमदेव था।

  12. 11.12 · संजय

    दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
    यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥

    divi sūryasahasrasya bhavedyugapadutthitā |
    yadi bhāḥ sadṛśī sā syādbhāsastasya mahātmanaḥ ||

    यदि आकाश में एक साथ हजार सूर्यों का प्रकाश फूट पड़े, तो शायद वह उस महात्मा के तेज के समान हो सके।

  13. 11.13 · संजय

    तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
    अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥

    tatraikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ pravibhaktamanekadhā |
    apaśyaddevadevasya śarīre pāṇḍavastadā ||

    तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव के उस शरीर में अनेक भागों में बँटे हुए सम्पूर्ण जगत को एक ही जगह स्थित देखा।

  14. 11.14 · संजय

    ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
    प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥

    tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭaromā dhanaṃjayaḥ |
    praṇamya śirasā devaṃ kṛtāñjalirabhāṣata ||

    तब आश्चर्य से भरे, रोमांचित धनञ्जय ने उस देव को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर कहा।

  15. 11.15 · अर्जुन

    पश्यामि देवांस्तव देव देहे
    सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
    ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
    मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥

    paśyāmi devāṃstava deva dehe
    sarvāṃstathā bhūtaviśeṣasaṃghān |
    brahmāṇamīśaṃ kamalāsanastha-
    mṛṣīṃśca sarvānuragāṃśca divyān ||

    अर्जुन बोले: हे देव, मैं आपके शरीर में सब देवताओं को और भाँति-भाँति के प्राणियों के समूहों को देख रहा हूँ — कमल पर विराजमान स्वामी ब्रह्मा को, सब ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी।

  16. 11.16 · अर्जुन

    अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
    पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
    नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
    पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥

    anekabāhūdaravaktranetraṃ
    paśyāmi tvāṃ sarvato’nantarūpam |
    nāntaṃ na madhyaṃ na punastavādiṃ
    paśyāmi viśveśvara viśvarūpa ||

    हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको सब ओर अनन्त रूपों में देख रहा हूँ — अनगिनत भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों के साथ। मुझे आपका न अन्त दिखता है, न मध्य, न आदि।

  17. 11.17 · अर्जुन

    किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
    तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
    पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
    द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥

    kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca
    tejorāśiṃ sarvato dīptimantam |
    paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantā-
    ddīptānalārkadyutimaprameyam ||

    मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब ओर चमकते तेज के पुंज के रूप में देख रहा हूँ — जिसे देख पाना कठिन है, जो जलती अग्नि और सूर्य की तरह चारों ओर दमक रहा है और जिसका कोई माप नहीं।

  18. 11.18 · अर्जुन

    त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं
    त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
    त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता
    सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥

    tvamakṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ
    tvamasya viśvasya paraṃ nidhānam |
    tvamavyayaḥ śāśvatadharmagoptā
    sanātanastvaṃ puruṣo mato me ||

    आप ही अविनाशी हैं, जानने योग्य परम तत्त्व हैं; आप ही इस जगत के अन्तिम आश्रय हैं। आप सनातन धर्म के अविनाशी रक्षक हैं; मेरी समझ में आप ही सनातन पुरुष हैं।

  19. 11.19 · अर्जुन

    अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-
    मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
    पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं
    स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥

    anādimadhyāntamanantavīrya-
    manantabāhuṃ śaśisūryanetram |
    paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktraṃ
    svatejasā viśvamidaṃ tapantam ||

    मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त शक्ति वाला, असंख्य भुजाओं वाला देख रहा हूँ; सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, आपका मुख धधकती अग्नि है, और आप अपने तेज से इस सारे जगत को तपा रहे हैं।

  20. 11.20 · अर्जुन

    द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि
    व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
    दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं
    लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥

    dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi
    vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ |
    dṛṣṭvādbhutaṃ rūpamugraṃ tavedaṃ
    lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman ||

    हे महात्मन, पृथ्वी और आकाश के बीच का यह सारा अन्तराल और सब दिशाएँ केवल आपसे ही भरी हुई हैं। आपका यह अद्भुत और भयंकर रूप देखकर तीनों लोक काँप रहे हैं।

  21. 11.21 · अर्जुन

    अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति
    केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
    स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः
    स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥

    amī hi tvāṃ surasaṃghā viśanti
    kecidbhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti |
    svastītyuktvā maharṣisiddhasaṃghāḥ
    stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ ||

    देवताओं के ये समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी स्तुति कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धों के समूह “कल्याण हो!” कहकर विपुल स्तोत्रों से आपका गुणगान कर रहे हैं।

  22. 11.22 · अर्जुन

    रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या
    विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
    गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा
    वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥

    rudrādityā vasavo ye ca sādhyā
    viśve’śvinau marutaścoṣmapāśca |
    gandharvayakṣāsurasiddhasaṃghā
    vīkṣante tvāṃ vismitāścaiva sarve ||

    रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुत और पितर, तथा गन्धर्वों, यक्षों, असुरों और सिद्धों के समूह — सब विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।

  23. 11.23 · अर्जुन

    रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं
    महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
    बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं
    दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥

    rūpaṃ mahatte bahuvaktranetraṃ
    mahābāho bahubāhūrupādam |
    bahūdaraṃ bahudaṃṣṭrākarālaṃ
    dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitāstathāham ||

    हे महाबाहो, अनेक मुखों और नेत्रों, अनेक भुजाओं, जंघाओं और चरणों, अनेक उदरों वाले और अनेक विकराल दाढ़ों से भयानक आपके इस विशाल रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हैं — और मैं भी।

  24. 11.24 · अर्जुन

    नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं
    व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
    दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा
    धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥

    nabhaḥspṛśaṃ dīptamanekavarṇaṃ
    vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram |
    dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā
    dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇo ||

    हे विष्णु, आकाश को छूते, अनेक रंगों में दमकते, फैले हुए मुखों और विशाल ज्वलन्त नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अन्तःकरण भीतर तक काँप उठा है; मुझे न धैर्य मिल रहा है, न शान्ति।

  25. 11.25 · अर्जुन

    दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि
    दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
    दिशो न जाने न लभे च शर्म
    प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

    daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni
    dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni |
    diśo na jāne na labhe ca śarma
    prasīda deveśa jagannivāsa ||

    विकराल दाढ़ों वाले और प्रलय की अग्नि जैसे आपके मुखों को देखकर मुझे दिशाओं का बोध नहीं रहा और कहीं शरण नहीं दिखती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।

  26. 11.26 · अर्जुन

    अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः
    सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
    भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ
    सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥

    amī ca tvāṃ dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ
    sarve sahaivāvanipālasaṃghaiḥ |
    bhīṣmo droṇaḥ sūtaputrastathāsau
    sahāsmadīyairapi yodhamukhyaiḥ ||

    धृतराष्ट्र के ये सब पुत्र राजाओं के समूहों सहित, और भीष्म, द्रोण तथा वह सूतपुत्र कर्ण, हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धाओं के साथ —

  27. 11.27 · अर्जुन

    वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति
    दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
    केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु
    संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥

    vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti
    daṃṣṭrākarālāni bhayānakāni |
    kecidvilagnā daśanāntareṣu
    saṃdṛśyante cūrṇitairuttamāṅgaiḥ ||

    — बड़े वेग से आपके दाढ़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ आपके दाँतों के बीच फँसे दिखाई दे रहे हैं, जिनके सिर चूर-चूर हो गए हैं।

  28. 11.28 · अर्जुन

    यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
    समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
    तथा तवामी नरलोकवीरा
    विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥

    yathā nadīnāṃ bahavo’mbuvegāḥ
    samudramevābhimukhā dravanti |
    tathā tavāmī naralokavīrā
    viśanti vaktrāṇyabhivijvalanti ||

    जैसे नदियों की अनेक धाराएँ तेजी से समुद्र की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही मनुष्य-लोक के ये वीर आपके धधकते मुखों में समा रहे हैं।

  29. 11.29 · अर्जुन

    यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
    विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
    तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
    स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

    yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā
    viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ |
    tathaiva nāśāya viśanti lokā-
    stavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ ||

    जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए पूरे वेग से जलती आग में कूद पड़ते हैं, वैसे ही ये सब लोग अपने विनाश के लिए पूरे वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

  30. 11.30 · अर्जुन

    लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता-
    ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
    तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं
    भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥

    lelihyase grasamānaḥ samantā-
    llokānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ |
    tejobhirāpūrya jagatsamagraṃ
    bhāsastavogrāḥ pratapanti viṣṇo ||

    हे विष्णु, अपने ज्वलन्त मुखों से सब ओर के लोकों को निगलते हुए आप होंठ चाट रहे हैं। आपकी प्रचण्ड किरणें सारे जगत को तेज से भरकर तपा रही हैं।

  31. 11.31 · अर्जुन

    आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
    नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
    विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
    न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥

    ākhyāhi me ko bhavānugrarūpo
    namo’stu te devavara prasīda |
    vijñātumicchāmi bhavantamādyaṃ
    na hi prajānāmi tava pravṛttim ||

    मुझे बताइए, इस भयंकर रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है — प्रसन्न होइए। मैं आप आदिपुरुष को जानना चाहता हूँ, क्योंकि आप क्या करना चाहते हैं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा।

  32. 11.32 · श्रीकृष्ण

    कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
    लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
    ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
    येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥

    kālo’smi lokakṣayakṛtpravṛddho
    lokānsamāhartumiha pravṛttaḥ |
    ṛte’pi tvāṃ na bhaviṣyanti sarve
    ye’vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ||

    श्रीभगवान बोले: मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। विरोधी सेनाओं में जो योद्धा खड़े हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं बचेंगे।

  33. 11.33 · श्रीकृष्ण

    तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
    जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
    मयैवैते निहताः पूर्वमेव
    निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥

    tasmāttvamuttiṣṭha yaśo labhasva
    jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham |
    mayaivaite nihatāḥ pūrvameva
    nimittamātraṃ bhava savyasācin ||

    इसलिए तुम उठो और यश प्राप्त करो। शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची, तुम केवल निमित्त बन जाओ।

  34. 11.34 · श्रीकृष्ण

    द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च
    कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
    मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा
    युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥

    droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca
    karṇaṃ tathānyānapi yodhavīrān |
    mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhā
    yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān ||

    द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य महान योद्धा भी मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं — तुम उन्हें मारो, व्यथित मत होओ। युद्ध करो; तुम रणभूमि में शत्रुओं को अवश्य जीतोगे।

  35. 11.35 · संजय

    एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
    कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
    नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
    सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥

    etacchrutvā vacanaṃ keśavasya
    kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī |
    namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ
    sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya ||

    संजय बोले: केशव के ये वचन सुनकर मुकुटधारी अर्जुन काँपते हुए हाथ जोड़कर नमस्कार करने लगे; और फिर से प्रणाम करके, भय से अभिभूत होकर, लड़खड़ाती वाणी में श्रीकृष्ण से बोले।

  36. 11.36 · अर्जुन

    स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
    जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
    रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
    सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥

    sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā
    jagatprahṛṣyatyanurajyate ca |
    rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti
    sarve namasyanti ca siddhasaṃghāḥ ||

    अर्जुन बोले: हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति गाकर संसार हर्षित होता है और आपसे प्रेम करता है। राक्षस भयभीत होकर सब दिशाओं में भाग रहे हैं, और सिद्धों के सब समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

  37. 11.37 · अर्जुन

    कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
    गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
    अनन्त देवेश जगन्निवास
    त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥

    kasmācca te na nameranmahātman
    garīyase brahmaṇo’pyādikartre |
    ananta deveśa jagannivāsa
    tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yat ||

    हे महात्मन, वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप तो आदि-स्रष्टा ब्रह्मा से भी बड़े हैं। हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप ही अक्षर हैं — सत् भी, असत् भी, और जो इन दोनों से परे है वह भी।

  38. 11.38 · अर्जुन

    त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
    स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
    वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
    त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥

    tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇa-
    stvamasya viśvasya paraṃ nidhānam |
    vettāsi vedyaṃ ca paraṃ ca dhāma
    tvayā tataṃ viśvamanantarūpa ||

    आप आदिदेव हैं, सनातन पुरुष हैं, इस जगत के परम आश्रय हैं। आप ही जानने वाले हैं और जानने योग्य भी, और आप ही परम धाम हैं। हे अनन्तरूप, यह सारा जगत आपसे व्याप्त है।

  39. 11.39 · अर्जुन

    वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
    प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
    नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
    पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥

    vāyuryamo’gnirvaruṇaḥ śaśāṅkaḥ
    prajāpatistvaṃ prapitāmahaśca |
    namo namaste’stu sahasrakṛtvaḥ
    punaśca bhūyo’pi namo namaste ||

    आप ही वायु, यम, अग्नि, वरुण और चन्द्रमा हैं; आप ही प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजार बार नमस्कार है; फिर से, और बार-बार आपको नमस्कार है!

  40. 11.40 · अर्जुन

    नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
    नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
    अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
    सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥

    namaḥ purastādatha pṛṣṭhataste
    namo’stu te sarvata eva sarva |
    anantavīryāmitavikramastvaṃ
    sarvaṃ samāpnoṣi tato’si sarvaḥ ||

    आपको आगे से नमस्कार, पीछे से नमस्कार; हे सर्वस्वरूप, आपको सब ओर से नमस्कार है। आपका पराक्रम अनन्त है, आपकी शक्ति असीम है; आप सबमें व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

  41. 11.41 · अर्जुन

    सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
    हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
    अजानता महिमानं तवेदं
    मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥

    sakheti matvā prasabhaṃ yaduktaṃ
    he kṛṣṇa he yādava he sakheti |
    ajānatā mahimānaṃ tavedaṃ
    mayā pramādātpraṇayena vāpi ||

    आपकी इस महिमा को न जानते हुए, आपको मित्र मानकर, असावधानी से या प्रेमवश मैंने बिना सोचे-समझे जो “हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा” कहा —

  42. 11.42 · अर्जुन

    यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
    विहारशय्यासनभोजनेषु ।
    एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
    तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥

    yaccāvahāsārthamasatkṛto’si
    vihāraśayyāsanabhojaneṣu |
    eko’thavāpyacyuta tatsamakṣaṃ
    tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam ||

    — और हे अच्युत, हँसी-मज़ाक में, खेलते, लेटते, बैठते या भोजन करते समय, अकेले में या दूसरों के सामने मुझसे आपका जो भी अनादर हुआ हो — उस सबके लिए मैं आप अपरिमेय से क्षमा माँगता हूँ।

  43. 11.43 · अर्जुन

    पितासि लोकस्य चराचरस्य
    त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
    न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
    लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥

    pitāsi lokasya carācarasya
    tvamasya pūjyaśca gururgarīyān |
    na tvatsamo’styabhyadhikaḥ kuto’nyo
    lokatraye’pyapratimaprabhāva ||

    आप इस चर-अचर जगत के पिता हैं, इसके पूज्य और सबसे श्रेष्ठ गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले, तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं, तो आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?

  44. 11.44 · अर्जुन

    तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
    प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
    पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
    प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥

    tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṃ
    prasādaye tvāmahamīśamīḍyam |
    piteva putrasya sakheva sakhyuḥ
    priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||

    इसलिए हे स्तुति के योग्य प्रभु, मैं अपने शरीर को आपके चरणों में डालकर प्रणाम करता हूँ और आपकी कृपा चाहता हूँ। हे देव, जैसे पिता पुत्र के, मित्र मित्र के और प्रियतम प्रिया के अपराध सह लेता है, वैसे ही आप मुझे क्षमा करें।

  45. 11.45 · अर्जुन

    अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
    भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
    तदेव मे दर्शय देव रूपं
    प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

    adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito’smi dṛṣṭvā
    bhayena ca pravyathitaṃ mano me |
    tadeva me darśaya deva rūpaṃ
    prasīda deveśa jagannivāsa ||

    जो पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखकर मैं हर्षित हूँ, पर मेरा मन भय से व्याकुल भी है। हे देव, मुझे अपना वही दूसरा रूप दिखाइए; हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।

  46. 11.46 · अर्जुन

    किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त-
    मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
    तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
    सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥

    kirīṭinaṃ gadinaṃ cakrahasta-
    micchāmi tvāṃ draṣṭumahaṃ tathaiva |
    tenaiva rūpeṇa caturbhujena
    sahasrabāho bhava viśvamūrte ||

    मैं आपको पहले की तरह मुकुट धारण किए, गदा और चक्र हाथ में लिए देखना चाहता हूँ। हे सहस्रबाहो, हे विश्वमूर्ते, आप फिर से वही चतुर्भुज रूप धारण कीजिए।

  47. 11.47 · श्रीकृष्ण

    मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं
    रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
    तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
    यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥

    mayā prasannena tavārjunedaṃ
    rūpaṃ paraṃ darśitamātmayogāt |
    tejomayaṃ viśvamanantamādyaṃ
    yanme tvadanyena na dṛṣṭapūrvam ||

    श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन, मैंने प्रसन्न होकर अपनी योग-शक्ति से तुम्हें यह परम रूप दिखाया है — तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त और आदि — जिसे तुम्हारे सिवा पहले किसी ने नहीं देखा।

  48. 11.48 · श्रीकृष्ण

    न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
    र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
    एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
    द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥

    na vedayajñādhyayanairna dānai-
    rna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ |
    evaṃrūpaḥ śakya ahaṃ nṛloke
    draṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra ||

    हे कुरुवीर, न वेदों से, न यज्ञों से, न अध्ययन से, न दान से, न कर्मकाण्ड से और न कठोर तपस्या से — मनुष्य-लोक में तुम्हारे सिवा कोई भी मुझे इस रूप में नहीं देख सकता।

  49. 11.49 · श्रीकृष्ण

    मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
    दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
    व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं
    तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥

    mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo
    dṛṣṭvā rūpaṃ ghoramīdṛṅmamedam |
    vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṃ
    tadeva me rūpamidaṃ prapaśya ||

    मेरे इस भयंकर रूप को देखकर तुम न डरो, न घबराओ। भय छोड़कर प्रसन्न मन से मेरे उसी परिचित रूप को फिर से देखो।

  50. 11.50 · संजय

    इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
    स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
    आश्वासयामास च भीतमेनं
    भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥

    ityarjunaṃ vāsudevastathoktvā
    svakaṃ rūpaṃ darśayāmāsa bhūyaḥ |
    āśvāsayāmāsa ca bhītamenaṃ
    bhūtvā punaḥ saumyavapurmahātmā ||

    संजय बोले: अर्जुन से ऐसा कहकर वासुदेव ने फिर से अपना वही रूप दिखाया। उस महात्मा ने पुनः सौम्य रूप धारण करके भयभीत अर्जुन को धीरज बँधाया।

  51. 11.51 · अर्जुन

    दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
    इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥

    dṛṣṭvedaṃ mānuṣaṃ rūpaṃ tava saumyaṃ janārdana |
    idānīmasmi saṃvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṃ gataḥ ||

    अर्जुन बोले: हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर अब मेरा मन स्थिर हो गया है और मैं अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आया हूँ।

  52. 11.52 · श्रीकृष्ण

    सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
    देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥

    sudurdarśamidaṃ rūpaṃ dṛṣṭavānasi yanmama |
    devā apyasya rūpasya nityaṃ darśanakāṅkṣiṇaḥ ||

    श्रीभगवान बोले: मेरा जो रूप तुमने देखा है, उसके दर्शन अत्यन्त दुर्लभ हैं। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा लालायित रहते हैं।

  53. 11.53 · श्रीकृष्ण

    नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
    शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥

    nāhaṃ vedairna tapasā na dānena na cejyayā |
    śakya evaṃvidho draṣṭuṃ dṛṣṭavānasi māṃ yathā ||

    जैसे तुमने मुझे देखा है, वैसे न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मुझे देखा जा सकता है।

  54. 11.54 · श्रीकृष्ण

    भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
    ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥

    bhaktyā tvananyayā śakya ahamevaṃvidho’rjuna |
    jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca paraṃtapa ||

    परन्तु हे परन्तप अर्जुन, अनन्य भक्ति के द्वारा मुझे इस प्रकार जाना जा सकता है, वास्तव में देखा जा सकता है और मुझमें प्रवेश भी किया जा सकता है।

  55. 11.55 · श्रीकृष्ण

    मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
    निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥

    matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
    nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||

    हे पाण्डव, जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है और किसी भी प्राणी से वैर नहीं रखता — वह मुझे प्राप्त होता है।

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