भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 17 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.17 · किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca
tejorāśiṃ sarvato dīptimantam |
paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantā-
ddīptānalārkadyutimaprameyam ||
हिन्दी अनुवाद
मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब ओर चमकते तेज के पुंज के रूप में देख रहा हूँ — जिसे देख पाना कठिन है, जो जलती अग्नि और सूर्य की तरह चारों ओर दमक रहा है और जिसका कोई माप नहीं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.17 का अर्थ क्या है?
मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए हुए, सब ओर चमकते तेज के पुंज के रूप में देख रहा हूँ — जिसे देख पाना कठिन है, जो जलती अग्नि और सूर्य की तरह चारों ओर दमक रहा है और जिसका कोई माप नहीं।
भगवद्गीता 11.17 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।