भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 29 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.29 · यथा प्रदीप्तं ज्वलनं
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥
yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā
viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ |
tathaiva nāśāya viśanti lokā-
stavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए पूरे वेग से जलती आग में कूद पड़ते हैं, वैसे ही ये सब लोग अपने विनाश के लिए पूरे वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.29 का अर्थ क्या है?
जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए पूरे वेग से जलती आग में कूद पड़ते हैं, वैसे ही ये सब लोग अपने विनाश के लिए पूरे वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
भगवद्गीता 11.29 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।