भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 13 · संजय
भगवद्गीता 11.13 · तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥
tatraikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ pravibhaktamanekadhā |
apaśyaddevadevasya śarīre pāṇḍavastadā ||
हिन्दी अनुवाद
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव के उस शरीर में अनेक भागों में बँटे हुए सम्पूर्ण जगत को एक ही जगह स्थित देखा।
प्रसंग
यह श्लोक संजय ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.13 का अर्थ क्या है?
तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव के उस शरीर में अनेक भागों में बँटे हुए सम्पूर्ण जगत को एक ही जगह स्थित देखा।
भगवद्गीता 11.13 किसने कहा है?
यह श्लोक संजय ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।