भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 11.32 · कालोऽस्मि
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे
येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
kālo’smi lokakṣayakṛtpravṛddho
lokānsamāhartumiha pravṛttaḥ |
ṛte’pi tvāṃ na bhaviṣyanti sarve
ye’vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान बोले: मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। विरोधी सेनाओं में जो योद्धा खड़े हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं बचेंगे।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.32 का अर्थ क्या है?
श्रीभगवान बोले: मैं लोकों का नाश करने वाला, बढ़ा हुआ काल हूँ, और यहाँ लोकों को समेटने में लगा हूँ। विरोधी सेनाओं में जो योद्धा खड़े हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं बचेंगे।
भगवद्गीता 11.32 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।