भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 48 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 11.48 · न वेदयज्ञाध्ययनैर्न
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥
na vedayajñādhyayanairna dānai-
rna ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ |
evaṃrūpaḥ śakya ahaṃ nṛloke
draṣṭuṃ tvadanyena kurupravīra ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुरुवीर, न वेदों से, न यज्ञों से, न अध्ययन से, न दान से, न कर्मकाण्ड से और न कठोर तपस्या से — मनुष्य-लोक में तुम्हारे सिवा कोई भी मुझे इस रूप में नहीं देख सकता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.48 का अर्थ क्या है?
हे कुरुवीर, न वेदों से, न यज्ञों से, न अध्ययन से, न दान से, न कर्मकाण्ड से और न कठोर तपस्या से — मनुष्य-लोक में तुम्हारे सिवा कोई भी मुझे इस रूप में नहीं देख सकता।
भगवद्गीता 11.48 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।