भगवद्गीता · अध्याय 1 / 18

अर्जुनविषादयोग — अर्जुन का विषाद

47 श्लोक

अध्याय का सार

कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं। संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वर्णन सुनाते हैं। अपने ही गुरुजनों और संबंधियों को सामने देखकर अर्जुन शोक और मोह में डूब जाते हैं, धनुष रख देते हैं और युद्ध करने से इनकार कर देते हैं।

सभी 47 श्लोक

  1. 1.1 · धृतराष्ट्र

    धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
    मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥

    dharmakṣetre kurukṣetre samavetā yuyutsavaḥ |
    māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||

    धृतराष्ट्र बोले: हे संजय, धर्म की भूमि कुरुक्षेत्र में लड़ने के लिए जुटे मेरे बेटों और पाण्डु के बेटों ने वहाँ क्या किया?

  2. 1.2 · संजय

    दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
    आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥

    dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ vyūḍhaṃ duryodhanastadā |
    ācāryamupasaṃgamya rājā vacanamabravīt ||

    संजय बोले: पाण्डवों की सेना को व्यूह में सजी देखकर राजा दुर्योधन अपने आचार्य द्रोण के पास गया और उनसे यह बात कही।

  3. 1.3 · संजय

    पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
    व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥

    paśyaitāṃ pāṇḍuputrāṇāmācārya mahatīṃ camūm |
    vyūḍhāṃ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā ||

    हे आचार्य, पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य, द्रुपद के पुत्र (धृष्टद्युम्न) ने व्यूह में खड़ा किया है।

  4. 1.4 · संजय

    अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
    युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥

    atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi |
    yuyudhāno virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ ||

    इस सेना में भीम और अर्जुन जैसे पराक्रमी, बड़े-बड़े धनुषधारी वीर हैं — युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद, —

  5. 1.5 · संजय

    धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
    पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥

    dhṛṣṭaketuścekitānaḥ kāśirājaśca vīryavān |
    purujitkuntibhojaśca śaibyaśca narapuṅgavaḥ ||

    — धृष्टकेतु, चेकितान और वीर काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, —

  6. 1.6 · संजय

    युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
    सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥

    yudhāmanyuśca vikrānta uttamaujāśca vīryavān |
    saubhadro draupadeyāśca sarva eva mahārathāḥ ||

    — पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्र — ये सभी महारथी हैं।

  7. 1.7 · संजय

    अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
    नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥

    asmākaṃ tu viśiṣṭā ye tānnibodha dvijottama |
    nāyakā mama sainyasya saṃjñārthaṃ tānbravīmi te ||

    हे द्विजश्रेष्ठ, अब हमारी ओर के प्रमुख योद्धाओं को भी जान लीजिए, जो मेरी सेना के नायक हैं। आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम बताता हूँ।

  8. 1.8 · संजय

    भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः ।
    अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥

    bhavānbhīṣmaśca karṇaśca kṛpaśca samitiṃjayaḥ |
    aśvatthāmā vikarṇaśca saumadattistathaiva ca ||

    स्वयं आप, भीष्म, कर्ण और युद्ध में सदा विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र (भूरिश्रवा)।

  9. 1.9 · संजय

    अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
    नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥

    anye ca bahavaḥ śūrā madarthe tyaktajīvitāḥ |
    nānāśastrapraharaṇāḥ sarve yuddhaviśāradāḥ ||

    और भी अनेक शूरवीर हैं जो मेरे लिए प्राण देने को तैयार हैं। सब तरह-तरह के शस्त्रों से सज्जित हैं और युद्ध-कला में निपुण हैं।

  10. 1.10 · संजय

    अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
    पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥

    aparyāptaṃ tadasmākaṃ balaṃ bhīṣmābhirakṣitam |
    paryāptaṃ tvidameteṣāṃ balaṃ bhīmābhirakṣitam ||

    भीष्म द्वारा रक्षित हमारी शक्ति अपार है, जबकि भीम द्वारा रक्षित उनकी शक्ति सीमित है।

  11. 1.11 · संजय

    अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
    भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

    ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgamavasthitāḥ |
    bhīṣmamevābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi ||

    इसलिए आप सब लोग सेना के सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह डटे रहकर हर ओर से भीष्म की ही रक्षा करें।

  12. 1.12 · संजय

    तस्य संजनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
    सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥

    tasya saṃjanayanharṣaṃ kuruvṛddhaḥ pitāmahaḥ |
    siṃhanādaṃ vinadyoccaiḥ śaṅkhaṃ dadhmau pratāpavān ||

    तब दुर्योधन के मन में उत्साह जगाते हुए कुरुवंश के प्रतापी वृद्ध पितामह भीष्म ने सिंह की तरह गरजकर ज़ोर से शंख बजाया।

  13. 1.13 · संजय

    ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
    सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥

    tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca paṇavānakagomukhāḥ |
    sahasaivābhyahanyanta sa śabdastumulo’bhavat ||

    इसके बाद शंख, नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे एक साथ बज उठे; वह कोलाहल बड़ा भयंकर था।

  14. 1.14 · संजय

    ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
    माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥

    tataḥ śvetairhayairyukte mahati syandane sthitau |
    mādhavaḥ pāṇḍavaścaiva divyau śaṅkhau pradadhmatuḥ ||

    तब सफ़ेद घोड़ों से जुते विशाल रथ पर बैठे माधव (कृष्ण) और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंख बजाए।

  15. 1.15 · संजय

    पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
    पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥

    pāñcajanyaṃ hṛṣīkeśo devadattaṃ dhanañjayaḥ |
    pauṇḍraṃ dadhmau mahāśaṅkhaṃ bhīmakarmā vṛkodaraḥ ||

    हृषीकेश ने पाञ्चजन्य, धनञ्जय ने देवदत्त, और भयानक कर्म करने वाले वृकोदर (भीम) ने पौण्ड्र नाम का महाशंख बजाया।

  16. 1.16 · संजय

    अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
    नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥

    anantavijayaṃ rājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ |
    nakulaḥ sahadevaśca sughoṣamaṇipuṣpakau ||

    कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक शंख बजाए।

  17. 1.17 · संजय

    काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
    धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥

    kāśyaśca parameṣvāsaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ |
    dhṛṣṭadyumno virāṭaśca sātyakiścāparājitaḥ ||

    श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और कभी न हारने वाले सात्यकि, —

  18. 1.18 · संजय

    द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
    सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥

    drupado draupadeyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpate |
    saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||

    — द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु — हे पृथ्वीपति, इन सबने चारों ओर से अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए।

  19. 1.19 · संजय

    स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
    नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥

    sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṃ hṛdayāni vyadārayat |
    nabhaśca pṛthivīṃ caiva tumulo vyanunādayan ||

    उस भयंकर नाद ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय दहला दिए।

  20. 1.20 · संजय

    अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः ।
    प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥

    atha vyavasthitāndṛṣṭvā dhārtarāṣṭrānkapidhvajaḥ |
    pravṛtte śastrasaṃpāte dhanurudyamya pāṇḍavaḥ ||

    हे राजन, तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को मोर्चा बाँधे खड़ा देखकर, जब शस्त्र चलने ही वाले थे, कपिध्वज (हनुमान के चिह्न वाली ध्वजा के स्वामी) पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठाया —

  21. 1.21 · अर्जुन

    हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
    सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥

    hṛṣīkeśaṃ tadā vākyamidamāha mahīpate |
    senayorubhayormadhye rathaṃ sthāpaya me’cyuta ||

    — और हे पृथ्वीपति, हृषीकेश से यह बात कही। अर्जुन बोले: हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कीजिए, —

  22. 1.22 · अर्जुन

    यावदेतान्निरिक्षेऽहं योद्‌धुकामानवस्थितान् ।
    कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥

    yāvadetānnirikṣe’haṃ yod‌dhukāmānavasthitān |
    kairmayā saha yoddhavyamasmin raṇasamudyame ||

    — ताकि मैं युद्ध की इच्छा से खड़े इन योद्धाओं को देख लूँ और जान लूँ कि इस रण में मुझे किन-किन से लड़ना है।

  23. 1.23 · अर्जुन

    योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
    धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥

    yotsyamānānavekṣe’haṃ ya ete’tra samāgatāḥ |
    dhārtarāṣṭrasya durbuddheryuddhe priyacikīrṣavaḥ ||

    मैं उन्हें देखना चाहता हूँ जो दुर्बुद्धि दुर्योधन का भला करने की इच्छा से यहाँ लड़ने के लिए जुटे हैं।

  24. 1.24 · संजय

    एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
    सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥

    evamukto hṛṣīkeśo guḍākeśena bhārata |
    senayorubhayormadhye sthāpayitvā rathottamam ||

    संजय बोले: हे भारत (धृतराष्ट्र), गुडाकेश (अर्जुन) के ऐसा कहने पर हृषीकेश ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले जाकर खड़ा कर दिया —

  25. 1.25 · संजय

    भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
    उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥

    bhīṣmadroṇapramukhataḥ sarveṣāṃ ca mahīkṣitām |
    uvāca pārtha paśyaitānsamavetānkurūniti ||

    — भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के ठीक सामने; और कहा: हे पार्थ, यहाँ इकट्ठे हुए इन कौरवों को देखो।

  26. 1.26 · संजय

    तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
    आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥

    tatrāpaśyatsthitānpārthaḥ pitṝnatha pitāmahān |
    ācāryānmātulānbhrātṝnputrānpautrānsakhīṃstathā ||

    वहाँ पार्थ ने दोनों सेनाओं में खड़े अपने ताऊ-चाचाओं, दादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा; —

  27. 1.27 · संजय

    श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
    तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥

    śvaśurānsuhṛdaścaiva senayorubhayorapi |
    tānsamīkṣya sa kaunteyaḥ sarvānbandhūnavasthitān ||

    — ससुरों और हितैषियों को भी। उन सब बन्धु-बान्धवों को सामने खड़ा देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुन —

  28. 1.28 · अर्जुन

    कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
    दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥

    kṛpayā parayāviṣṭo viṣīdannidamabravīt |
    dṛṣṭvemaṃ svajanaṃ kṛṣṇa yuyutsuṃ samupasthitam ||

    — गहरी करुणा से भर गए और शोक में डूबकर बोले। अर्जुन बोले: हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से सामने खड़े अपने ही लोगों को देखकर —

  29. 1.29 · अर्जुन

    सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
    वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥

    sīdanti mama gātrāṇi mukhaṃ ca pariśuṣyati |
    vepathuśca śarīre me romaharṣaśca jāyate ||

    — मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।

  30. 1.30 · अर्जुन

    गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
    न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥

    gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate |
    na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||

    गाण्डीव धनुष हाथ से फिसल रहा है और त्वचा जल रही है। मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा; मेरा मन चकरा रहा है।

  31. 1.31 · अर्जुन

    निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
    न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥

    nimittāni ca paśyāmi viparītāni keśava |
    na ca śreyo’nupaśyāmi hatvā svajanamāhave ||

    हे केशव, मुझे शकुन भी उलटे दिखाई दे रहे हैं। युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई भलाई नहीं दिखती।

  32. 1.32 · अर्जुन

    न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
    किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥

    na kāṅkṣe vijayaṃ kṛṣṇa na ca rājyaṃ sukhāni ca |
    kiṃ no rājyena govinda kiṃ bhogairjīvitena vā ||

    हे कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। हे गोविन्द, हमें राज्य से, भोगों से, या जीवित रहने से भी क्या लाभ?

  33. 1.33 · अर्जुन

    येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
    त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥

    yeṣāmarthe kāṅkṣitaṃ no rājyaṃ bhogāḥ sukhāni ca |
    ta ime’vasthitā yuddhe prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca ||

    जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वही लोग जीवन और धन का मोह छोड़कर यहाँ युद्ध के लिए खड़े हैं —

  34. 1.34 · अर्जुन

    आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
    मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबन्धिनस्तथा ॥

    ācāryāḥ pitaraḥ putrāstathaiva ca pitāmahāḥ |
    mātulāḥ śvaśurāḥ pautrāḥ śyālāḥ saṃbandhinastathā ||

    — गुरुजन, ताऊ-चाचा, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पौत्र, साले और दूसरे सम्बन्धी।

  35. 1.35 · अर्जुन

    एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
    अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥

    etānna hantumicchāmi ghnato’pi madhusūdana |
    api trailokyarājyasya hetoḥ kiṃ nu mahīkṛte ||

    हे मधुसूदन, चाहे ये मुझे मार डालें, मैं इन्हें मारना नहीं चाहता — तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस धरती के लिए तो कहना ही क्या।

  36. 1.36 · अर्जुन

    निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
    पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥

    nihatya dhārtarāṣṭrānnaḥ kā prītiḥ syājjanārdana |
    pāpamevāśrayedasmānhatvaitānātatāyinaḥ ||

    हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? ये आततायी ही सही, इन्हें मारकर हमें पाप ही लगेगा।

  37. 1.37 · अर्जुन

    तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
    स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥

    tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān |
    svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ||

    इसलिए अपने ही बन्धु धृतराष्ट्रपुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मारकर हम भला सुखी कैसे होंगे?

  38. 1.38 · अर्जुन

    यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
    कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥

    yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
    kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam ||

    यद्यपि लोभ से विवेक खो चुके ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से विश्वासघात के पाप को नहीं देखते, —

  39. 1.39 · अर्जुन

    कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
    कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥

    kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum |
    kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdana ||

    — फिर भी हे जनार्दन, कुल-नाश के दोष को साफ़ देखने वाले हम लोग इस पाप से पीछे हटना क्यों न सीखें?

  40. 1.40 · अर्जुन

    कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
    धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥

    kulakṣaye praṇaśyanti kuladharmāḥ sanātanāḥ |
    dharme naṣṭe kulaṃ kṛtsnamadharmo’bhibhavatyuta ||

    कुल का नाश होने पर कुल की सनातन परंपराएँ (कुल-धर्म) नष्ट हो जाती हैं, और धर्म के नष्ट होने पर पूरे कुल को अधर्म घेर लेता है।

  41. 1.41 · अर्जुन

    अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
    स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥

    adharmābhibhavātkṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ |
    strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṃkaraḥ ||

    हे कृष्ण, अधर्म बढ़ने पर कुल की स्त्रियाँ पथभ्रष्ट हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय, स्त्रियों के भ्रष्ट होने पर वर्णों का मिश्रण (वर्णसंकर) पैदा होता है।

  42. 1.42 · अर्जुन

    संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
    पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥

    saṃkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca |
    patanti pitaro hyeṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥ ||

    यह वर्णसंकर कुल का नाश करने वालों को और स्वयं कुल को नरक में ले जाता है; क्योंकि पिण्ड और जल-तर्पण की क्रिया छूट जाने से उनके पितर भी गिर जाते हैं।

  43. 1.43 · अर्जुन

    दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
    उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥

    doṣairetaiḥ kulaghnānāṃ varṇasaṃkarakārakaiḥ |
    utsādyante jātidharmāḥ kuladharmāśca śāśvatāḥ ||

    कुल का नाश करने वालों के इन दोषों से, जो वर्णसंकर को जन्म देते हैं, सनातन जाति-धर्म और कुल-धर्म उजड़ जाते हैं।

  44. 1.44 · अर्जुन

    उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
    नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥

    utsannakuladharmāṇāṃ manuṣyāṇāṃ janārdana |
    narake’niyataṃ vāso bhavatītyanuśuśruma ||

    हे जनार्दन, हमने सुना है कि जिन मनुष्यों के कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें अनिश्चित काल तक नरक में रहना पड़ता है।

  45. 1.45 · अर्जुन

    अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
    यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥

    aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |
    yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||

    हाय, कितने दुःख की बात है कि हम बड़ा पाप करने पर तुले हुए हैं — राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने को तैयार हो गए हैं।

  46. 1.46 · अर्जुन

    यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
    धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥

    yadi māmapratīkāramaśastraṃ śastrapāṇayaḥ |
    dhārtarāṣṭrā raṇe hanyustanme kṣemataraṃ bhavet ||

    यदि हाथों में शस्त्र लिए धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निहत्थे और प्रतिकार न करने वाले को युद्ध में मार भी डालें, तो वह मेरे लिए कहीं अधिक कल्याणकारी होगा।

  47. 1.47 · संजय

    एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
    विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥

    evamuktvārjunaḥ saṃkhye rathopastha upāviśat |
    visṛjya saśaraṃ cāpaṃ śokasaṃvignamānasaḥ ||

    संजय बोले: रणभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन धनुष-बाण छोड़कर रथ के आसन पर बैठ गए।

पाठ गिनती

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