भगवद्गीता · अध्याय 1, श्लोक 45 · अर्जुन
भगवद्गीता 1.45 · अहो बत महत्पापं कर्तुं
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
aho bata mahatpāpaṃ kartuṃ vyavasitā vayam |
yadrājyasukhalobhena hantuṃ svajanamudyatāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हाय, कितने दुःख की बात है कि हम बड़ा पाप करने पर तुले हुए हैं — राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने को तैयार हो गए हैं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 1.45 का अर्थ क्या है?
हाय, कितने दुःख की बात है कि हम बड़ा पाप करने पर तुले हुए हैं — राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों को मारने को तैयार हो गए हैं।
भगवद्गीता 1.45 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।