भगवद्गीता · अध्याय 1, श्लोक 30 · अर्जुन
भगवद्गीता 1.30 · गाण्डीवं स्रंसते
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥
gāṇḍīvaṃ sraṃsate hastāttvakcaiva paridahyate |
na ca śaknomyavasthātuṃ bhramatīva ca me manaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
गाण्डीव धनुष हाथ से फिसल रहा है और त्वचा जल रही है। मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा; मेरा मन चकरा रहा है।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 1.30 का अर्थ क्या है?
गाण्डीव धनुष हाथ से फिसल रहा है और त्वचा जल रही है। मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा; मेरा मन चकरा रहा है।
भगवद्गीता 1.30 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।