भगवद्गीता · अध्याय 1, श्लोक 37 · अर्जुन
भगवद्गीता 1.37 · तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥
tasmānnārhā vayaṃ hantuṃ dhārtarāṣṭrānsvabāndhavān |
svajanaṃ hi kathaṃ hatvā sukhinaḥ syāma mādhava ||
हिन्दी अनुवाद
इसलिए अपने ही बन्धु धृतराष्ट्रपुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मारकर हम भला सुखी कैसे होंगे?
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 1.37 का अर्थ क्या है?
इसलिए अपने ही बन्धु धृतराष्ट्रपुत्रों को मारना हमारे लिए उचित नहीं। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मारकर हम भला सुखी कैसे होंगे?
भगवद्गीता 1.37 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।