भगवद्गीता · अध्याय 13 / 18
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग — क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग
34 श्लोक
अध्याय का सार
शरीर “क्षेत्र” है और उसे जानने वाला “क्षेत्रज्ञ”। कृष्ण ज्ञान के लक्षण — विनम्रता, अहिंसा, धैर्य — बताते हैं और प्रकृति तथा पुरुष का भेद समझाते हैं। जो सब प्राणियों में एक ही परमेश्वर को देखता है, वही सच में देखता है।
सभी 34 श्लोक
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13.1 · श्रीकृष्ण
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate |
etadyo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ ||श्रीभगवान बोले: हे कुन्तीपुत्र, इस शरीर को क्षेत्र कहा जाता है। जो इसे जानता है, उसे इस विषय के जानकार क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
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13.2 · श्रीकृष्ण
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata |
kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama ||हे भारत, सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, मेरे मत में वही सच्चा ज्ञान है।
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13.3 · श्रीकृष्ण
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥tatkṣetraṃ yacca yādṛkca yadvikāri yataśca yat |
sa ca yo yatprabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu ||वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसमें कौन-से विकार होते हैं और वह किससे उत्पन्न होता है; तथा वह क्षेत्रज्ञ कौन है और उसकी क्या शक्ति है — यह सब संक्षेप में मुझसे सुनो।
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13.4 · श्रीकृष्ण
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak |
brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ ||ऋषियों ने इस विषय को अनेक प्रकार से, विविध वैदिक छन्दों में अलग-अलग गाया है, और ब्रह्मसूत्र के उन युक्तिपूर्ण, निश्चित वचनों में भी इसका वर्णन हुआ है।
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13.5 · श्रीकृष्ण
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥mahābhūtānyahaṃkāro buddhiravyaktameva ca |
indriyāṇi daśaikaṃ ca pañca cendriyagocarāḥ ||पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त प्रकृति; दस इन्द्रियाँ और एक मन; तथा इन्द्रियों के पाँच विषय —
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13.6 · श्रीकृष्ण
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥icchā dveṣaḥ sukhaṃ duḥkhaṃ saṃghātaścetanā dhṛtiḥ |
etatkṣetraṃ samāsena savikāramudāhṛtam ||— इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर-रूपी संघात, चेतना और धृति — इस प्रकार विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप में बताया गया।
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13.7 · श्रीकृष्ण
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥amānitvamadambhitvamahiṃsā kṣāntirārjavam |
ācāryopāsanaṃ śaucaṃ sthairyamātmavinigrahaḥ ||विनम्रता, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमाशीलता, सरलता, गुरु की सेवा, पवित्रता, स्थिरता और अपने ऊपर संयम —
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13.8 · श्रीकृष्ण
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥indriyārtheṣu vairāgyamanahaṃkāra eva ca |
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadoṣānudarśanam ||— इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का न होना, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे तथा रोग में छिपे दुःख और दोष को बार-बार स्पष्ट देखना —
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13.9 · श्रीकृष्ण
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥asaktiranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu |
nityaṃ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭopapattiṣu ||— आसक्ति न रखना, पुत्र, पत्नी, घर आदि से चिपके न रहना, और मनचाही या अनचाही हर परिस्थिति में मन का सदा सम बने रहना —
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13.10 · श्रीकृष्ण
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī |
viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadi ||— अनन्य योग के द्वारा मुझमें अटल भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की रुचि, और लोगों की भीड़ में मन न लगना —
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13.11 · श्रीकृष्ण
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥adhyātmajñānanityatvaṃ tattvajñānārthadarśanam |
etajjñānamiti proktamajñānaṃ yadato’nyathā ||— आत्मा के ज्ञान में निरन्तर लगे रहना और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य को समझना — इसी को ज्ञान कहा गया है; जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है।
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13.12 · श्रीकृष्ण
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi yajjñātvāmṛtamaśnute |
anādi matparaṃ brahma na sattannāsaducyate ||अब मैं वह बताऊँगा जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमरता पाता है। वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्।
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13.13 · श्रीकृष्ण
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥sarvataḥ pāṇipādaṃ tatsarvato’kṣiśiromukham |
sarvataḥ śrutimalloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान भी सब ओर हैं। वह संसार में सबको घेरकर स्थित है।
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13.14 · श्रीकृष्ण
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam |
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca ||वह सब इन्द्रियों के कार्यों में झलकता है, फिर भी स्वयं सभी इन्द्रियों से रहित है। वह अनासक्त होकर भी सबको धारण करता है, और गुणों से परे होकर भी गुणों का भोक्ता है।
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13.15 · श्रीकृष्ण
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca |
sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat ||वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; अचल भी है और चल भी। सूक्ष्म होने के कारण वह जाना नहीं जाता; वह बहुत दूर भी है और अत्यन्त निकट भी।
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13.16 · श्रीकृष्ण
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam |
bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca ||वह अविभक्त है, फिर भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा प्रतीत होता है। उसे प्राणियों का पालनकर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्तिकर्ता जानना चाहिए।
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13.17 · श्रीकृष्ण
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate |
jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam ||वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है और अन्धकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञान है, वही जानने योग्य है और ज्ञान से ही उसे पाया जाता है; वह सबके हृदय में विराजमान है।
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13.18 · श्रीकृष्ण
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥iti kṣetraṃ tathā jñānaṃ jñeyaṃ coktaṃ samāsataḥ |
madbhakta etadvijñāya madbhāvāyopapadyate ||इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया गया। मेरा भक्त इसे भली-भाँति समझकर मेरे भाव को प्राप्त होता है।
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13.19 · श्रीकृष्ण
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi |
vikārāṃśca guṇāṃścaiva viddhi prakṛtisaṃbhavān ||प्रकृति और पुरुष, दोनों को अनादि जानो; और यह भी जानो कि सारे विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं।
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13.20 · श्रीकृष्ण
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥kāryakaraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate |
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate ||कार्य, करण और कर्तापन को उत्पन्न करने में प्रकृति को कारण कहा जाता है; और सुख-दुःख के अनुभव में पुरुष को कारण कहा जाता है।
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13.21 · श्रीकृष्ण
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijānguṇān |
kāraṇaṃ guṇasaṅgo’sya sadasadyonijanmasu ||प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों के साथ जुड़ाव ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
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13.22 · श्रीकृष्ण
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥upadraṣṭānumantā ca bhartā bhoktā maheśvaraḥ |
paramātmeti cāpyukto dehe’sminpuruṣaḥ paraḥ ||इस शरीर में जो परम पुरुष है, उसे साक्षी, अनुमति देने वाला, धारण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा भी कहा गया है।
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13.23 · श्रीकृष्ण
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ya evaṃ vetti puruṣaṃ prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamāno’pi na sa bhūyo’bhijāyate ||जो इस प्रकार पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को जान लेता है, वह किसी भी प्रकार का जीवन जीते हुए भी फिर जन्म नहीं लेता।
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13.24 · श्रीकृष्ण
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥dhyānenātmani paśyanti kecidātmānamātmanā |
anye sāṃkhyena yogena karmayogena cāpare ||कुछ लोग ध्यान के द्वारा अपने ही मन से अपने भीतर आत्मा का दर्शन करते हैं; कुछ सांख्ययोग के द्वारा और कुछ कर्मयोग के द्वारा।
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13.25 · श्रीकृष्ण
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥anye tvevamajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate |
te’pi cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ ||कुछ लोग यह सब स्वयं न जानकर दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। सुने हुए उपदेश के प्रति निष्ठा रखने वाले वे भी मृत्यु के पार चले जाते हैं।
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13.26 · श्रीकृष्ण
यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥yāvatsaṃjāyate kiṃcitsattvaṃ sthāvarajaṅgamam |
kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha ||हे भरतश्रेष्ठ, जो भी स्थावर या जंगम प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुआ जानो।
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13.27 · श्रीकृष्ण
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram |
vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati ||जो नाशवान सब प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में देखता है।
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13.28 · श्रीकृष्ण
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram |
na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim ||जो सर्वत्र समान रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह स्वयं ही अपनी आत्मा का अहित नहीं करता, और इसलिए परम गति को पाता है।
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13.29 · श्रीकृष्ण
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati ||जो देखता है कि सारे कर्म केवल प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हैं, और आत्मा कर्ता नहीं है, वही सही देखता है।
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13.30 · श्रीकृष्ण
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥yadā bhūtapṛthagbhāvamekasthamanupaśyati |
tata eva ca vistāraṃ brahma saṃpadyate tadā ||जब मनुष्य प्राणियों के अलग-अलग अस्तित्व को एक ही में स्थित देखता है, और उसी एक से सबका विस्तार होते देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
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13.31 · श्रीकृष्ण
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ |
śarīrastho’pi kaunteya na karoti na lipyate ||हे कुन्तीपुत्र, अनादि और गुणों से परे होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है और न किसी कर्म से लिप्त होता है।
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13.32 · श्रीकृष्ण
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate |
sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate ||जैसे सब ओर व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही पूरे शरीर में स्थित आत्मा भी लिप्त नहीं होती।
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13.33 · श्रीकृष्ण
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥yathā prakāśayatyekaḥ kṛtsnaṃ lokamimaṃ raviḥ |
kṣetraṃ kṣetrī tathā kṛtsnaṃ prakāśayati bhārata ||हे भारत, जैसे एक ही सूर्य इस पूरे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्र का स्वामी, क्षेत्रज्ञ, पूरे क्षेत्र को प्रकाशित करता है।
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13.34 · श्रीकृष्ण
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā |
bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param ||जो ज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के इस भेद को, और प्राणियों के प्रकृति से छूटने के उपाय को जान लेते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं।