भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.14 · सर्वेन्द्रियगुणाभासं

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥

sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam |
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca ||

हिन्दी अनुवाद

वह सब इन्द्रियों के कार्यों में झलकता है, फिर भी स्वयं सभी इन्द्रियों से रहित है। वह अनासक्त होकर भी सबको धारण करता है, और गुणों से परे होकर भी गुणों का भोक्ता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.14 का अर्थ क्या है?

वह सब इन्द्रियों के कार्यों में झलकता है, फिर भी स्वयं सभी इन्द्रियों से रहित है। वह अनासक्त होकर भी सबको धारण करता है, और गुणों से परे होकर भी गुणों का भोक्ता है।

भगवद्गीता 13.14 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।