भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 13.17 · ज्योतिषामपि परमुच्यते
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate |
jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam ||
हिन्दी अनुवाद
वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है और अन्धकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञान है, वही जानने योग्य है और ज्ञान से ही उसे पाया जाता है; वह सबके हृदय में विराजमान है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 13.17 का अर्थ क्या है?
वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है और अन्धकार से परे कहा जाता है। वही ज्ञान है, वही जानने योग्य है और ज्ञान से ही उसे पाया जाता है; वह सबके हृदय में विराजमान है।
भगवद्गीता 13.17 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।