भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 13.31 · अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ |
śarīrastho’pi kaunteya na karoti na lipyate ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, अनादि और गुणों से परे होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है और न किसी कर्म से लिप्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 13.31 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, अनादि और गुणों से परे होने के कारण यह अविनाशी परमात्मा शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है और न किसी कर्म से लिप्त होता है।
भगवद्गीता 13.31 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।