भगवद्गीता · अध्याय 15 / 18

पुरुषोत्तमयोग — पुरुषोत्तम योग

20 श्लोक

अध्याय का सार

संसार एक उलटे पीपल वृक्ष जैसा है, जिसकी जड़ें ऊपर हैं; उसे वैराग्य की तलवार से काटना है। जीव भगवान का ही सनातन अंश है। कृष्ण स्वयं को क्षर और अक्षर दोनों से परे पुरुषोत्तम बताते हैं।

सभी 20 श्लोक

  1. 15.1 · श्रीकृष्ण

    ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
    छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

    ūrdhvamūlamadhaḥśākhamaśvatthaṃ prāhuravyayam |
    chandāṃsi yasya parṇāni yastaṃ veda sa vedavit ||

    श्रीभगवान बोले: एक अविनाशी अश्वत्थ वृक्ष बताया जाता है, जिसकी जड़ें ऊपर हैं और शाखाएँ नीचे। वेद के छन्द उसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जानता है, वही वेद को जानता है।

  2. 15.2 · श्रीकृष्ण

    अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
    गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
    अधश्च मूलान्यनुसंततानि
    कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥

    adhaścordhvaṃ prasṛtāstasya śākhā
    guṇapravṛddhā viṣayapravālāḥ |
    adhaśca mūlānyanusaṃtatāni
    karmānubandhīni manuṣyaloke ||

    उसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, गुणों से पोषित हैं, और इन्द्रियों के विषय उसकी कोंपलें हैं। मनुष्यलोक में कर्मों से बाँधने वाली उसकी जड़ें नीचे की ओर भी फैली हुई हैं।

  3. 15.3 · श्रीकृष्ण

    न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
    नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
    अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
    मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥

    na rūpamasyeha tathopalabhyate
    nānto na cādirna ca saṃpratiṣṭhā |
    aśvatthamenaṃ suvirūḍhamūla-
    masaṅgaśastreṇa dṛḍhena chittvā ||

    यहाँ उसका असली रूप दिखाई नहीं देता — न उसका अन्त, न आरम्भ, न उसकी नींव। गहरी जमी जड़ों वाले इस अश्वत्थ को वैराग्य के दृढ़ शस्त्र से काटकर —

  4. 15.4 · श्रीकृष्ण

    ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
    यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
    तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
    यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

    tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ
    yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ |
    tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye
    yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||

    — फिर उस पद की खोज करनी चाहिए जहाँ पहुँचकर कोई लौटता नहीं, इस भाव से कि “मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवाह फैला है।”

  5. 15.5 · श्रीकृष्ण

    निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
    अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
    द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
    र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥

    nirmānamohā jitasaṅgadoṣā
    adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ |
    dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñai-
    rgacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ||

    जो मान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में लगे रहते हैं, जिनकी कामनाएँ शान्त हो गई हैं, और जो सुख-दुःख नाम के द्वन्द्वों से छूट गए हैं — ऐसे मोहरहित ज्ञानी उस अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

  6. 15.6 · श्रीकृष्ण

    न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
    यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

    na tadbhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ |
    yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||

    उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा, न अग्नि। जिसे पाकर लोग लौटते नहीं, वही मेरा परम धाम है।

  7. 15.7 · श्रीकृष्ण

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

    mamaivāṃśo jīvaloke jīvabhūtaḥ sanātanaḥ |
    manaḥṣaṣṭhānīndriyāṇi prakṛtisthāni karṣati ||

    जीवों के इस संसार में मेरा ही सनातन अंश जीवात्मा बनता है। वह प्रकृति में स्थित पाँच इन्द्रियों और मन को अपनी ओर खींच लेता है।

  8. 15.8 · श्रीकृष्ण

    शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
    गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥

    śarīraṃ yadavāpnoti yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ |
    gṛhītvaitāni saṃyāti vāyurgandhānivāśayāt ||

    शरीर का स्वामी जब शरीर ग्रहण करता है और जब उसे छोड़ता है, तब इन्हें साथ लेकर वैसे ही चला जाता है जैसे हवा फूलों के स्थान से सुगन्ध ले जाती है।

  9. 15.9 · श्रीकृष्ण

    श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
    अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥

    śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca |
    adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ||

    कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, तथा मन का आश्रय लेकर वह विषयों का अनुभव करता है।

  10. 15.10 · श्रीकृष्ण

    उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
    विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥

    utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam |
    vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ||

    शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में रहते हुए, या गुणों से युक्त होकर भोगते हुए भी मूढ़ लोग उसे नहीं देख पाते; ज्ञान की आँख वाले ही उसे देखते हैं।

  11. 15.11 · श्रीकृष्ण

    यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
    यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥

    yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam |
    yatanto’pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ ||

    प्रयत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं; पर जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ और जिनमें विवेक नहीं है, वे प्रयत्न करके भी उसे नहीं देख पाते।

  12. 15.12 · श्रीकृष्ण

    यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
    यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥

    yadādityagataṃ tejo jagadbhāsayate’khilam |
    yaccandramasi yaccāgnau tattejo viddhi māmakam ||

    सूर्य में स्थित जो तेज पूरे संसार को प्रकाशित करता है, और जो तेज चन्द्रमा तथा अग्नि में है — उस तेज को मेरा ही जानो।

  13. 15.13 · श्रीकृष्ण

    गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
    पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥

    gāmāviśya ca bhūtāni dhārayāmyahamojasā |
    puṣṇāmi cauṣadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ ||

    मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रस से भरा चन्द्रमा बनकर सारी वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।

  14. 15.14 · श्रीकृष्ण

    अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
    प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

    ahaṃ vaiśvānaro bhūtvā prāṇināṃ dehamāśritaḥ |
    prāṇāpānasamāyuktaḥ pacāmyannaṃ caturvidham ||

    मैं ही प्राणियों के शरीर में वैश्वानर अग्नि बनकर, प्राण और अपान से युक्त होकर, चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

  15. 15.15 · श्रीकृष्ण

    सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
    मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
    वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
    वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥

    sarvasya cāhaṃ hṛdi saṃniviṣṭo
    mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ ca |
    vedaiśca sarvairahameva vedyo
    vedāntakṛdvedavideva cāham ||

    मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। स्मृति, ज्ञान और उनका लोप मुझसे ही होता है। सारे वेदों के द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदान्त का रचयिता और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

  16. 15.16 · श्रीकृष्ण

    द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
    क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

    dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca |
    kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho’kṣara ucyate ||

    इस संसार में दो पुरुष हैं — क्षर और अक्षर। सभी प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ है, अर्थात अपरिवर्तनशील, वह अक्षर कहलाता है।

  17. 15.17 · श्रीकृष्ण

    उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
    यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

    uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ |
    yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ ||

    पर उत्तम पुरुष तो इनसे भिन्न है, जिसे परमात्मा कहा जाता है; वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन करता है।

  18. 15.18 · श्रीकृष्ण

    यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
    अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

    yasmātkṣaramatīto’hamakṣarādapi cottamaḥ |
    ato’smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ ||

    क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में और वेद में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

  19. 15.19 · श्रीकृष्ण

    यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
    स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥

    yo māmevamasaṃmūḍho jānāti puruṣottamam |
    sa sarvavidbhajati māṃ sarvabhāvena bhārata ||

    हे भारत, जो मोह से मुक्त होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जानता है और पूरे भाव से मेरी भक्ति करता है।

  20. 15.20 · श्रीकृष्ण

    इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
    एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥

    iti guhyatamaṃ śāstramidamuktaṃ mayānagha |
    etad‌buddhvā buddhimānsyātkṛtakṛtyaśca bhārata ||

    हे निष्पाप, इस प्रकार मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गुप्त शास्त्र बताया। हे भारत, इसे समझकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतार्थ हो जाता है।

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