भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 15.15 · सर्वस्य चाहं हृदि

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥

sarvasya cāhaṃ hṛdi saṃniviṣṭo
mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ ca |
vedaiśca sarvairahameva vedyo
vedāntakṛdvedavideva cāham ||

हिन्दी अनुवाद

मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। स्मृति, ज्ञान और उनका लोप मुझसे ही होता है। सारे वेदों के द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदान्त का रचयिता और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 15.15 का अर्थ क्या है?

मैं सबके हृदय में बैठा हूँ। स्मृति, ज्ञान और उनका लोप मुझसे ही होता है। सारे वेदों के द्वारा जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदान्त का रचयिता और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

भगवद्गीता 15.15 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।