भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 15.16 · द्वाविमौ पुरुषौ लोके एव

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca |
kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho’kṣara ucyate ||

हिन्दी अनुवाद

इस संसार में दो पुरुष हैं — क्षर और अक्षर। सभी प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ है, अर्थात अपरिवर्तनशील, वह अक्षर कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 15.16 का अर्थ क्या है?

इस संसार में दो पुरुष हैं — क्षर और अक्षर। सभी प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ है, अर्थात अपरिवर्तनशील, वह अक्षर कहलाता है।

भगवद्गीता 15.16 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।