भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 19 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 14.19 · नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭānupaśyati |
guṇebhyaśca paraṃ vetti madbhāvaṃ so’dhigacchati ||
हिन्दी अनुवाद
जब द्रष्टा गुणों के सिवा किसी और को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे तत्त्व को जान लेता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 14.19 का अर्थ क्या है?
जब द्रष्टा गुणों के सिवा किसी और को कर्ता नहीं देखता और गुणों से परे तत्त्व को जान लेता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।
भगवद्गीता 14.19 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।