भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 34 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 10.34 · मृत्युः भविष्यताम्
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
mṛtyuḥ sarvaharaścāhamudbhavaśca bhaviṣyatām |
kīrtiḥ śrīrvākca nārīṇāṃ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā ||
हिन्दी अनुवाद
सबको हर लेने वाली मृत्यु मैं हूँ और आगे होने वाली हर वस्तु का उद्गम भी मैं हूँ। स्त्री-वाचक गुणों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.34 का अर्थ क्या है?
सबको हर लेने वाली मृत्यु मैं हूँ और आगे होने वाली हर वस्तु का उद्गम भी मैं हूँ। स्त्री-वाचक गुणों में मैं कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
भगवद्गीता 10.34 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।