भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 10.33 · अक्षराणामकारोऽस्मि च

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥

akṣarāṇāmakāro’smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca |
ahamevākṣayaḥ kālo dhātāhaṃ viśvatomukhaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

अक्षरों में मैं ‘अ’ कार हूँ और समासों में द्वन्द्व समास। अक्षय काल मैं ही हूँ, और सब ओर मुख वाला, सबका पालन करने वाला भी मैं ही हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 10.33 का अर्थ क्या है?

अक्षरों में मैं ‘अ’ कार हूँ और समासों में द्वन्द्व समास। अक्षय काल मैं ही हूँ, और सब ओर मुख वाला, सबका पालन करने वाला भी मैं ही हूँ।

भगवद्गीता 10.33 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।