भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 9.6 · यथाकाशस्थितो नित्यं

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥

yathākāśasthito nityaṃ vāyuḥ sarvatrago mahān |
tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya ||

हिन्दी अनुवाद

जैसे सर्वत्र विचरने वाला प्रबल वायु सदा आकाश में ही स्थित रहता है, वैसे ही समझो कि सब प्राणी मुझमें स्थित हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 9.6 का अर्थ क्या है?

जैसे सर्वत्र विचरने वाला प्रबल वायु सदा आकाश में ही स्थित रहता है, वैसे ही समझो कि सब प्राणी मुझमें स्थित हैं।

भगवद्गीता 9.6 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।