भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.7 · सर्वभूतानि कौन्तेय
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
sarvabhūtāni kaunteya prakṛtiṃ yānti māmikām |
kalpakṣaye punastāni kalpādau visṛjāmyaham ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और नए कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से प्रकट करता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.7 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और नए कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर से प्रकट करता हूँ।
भगवद्गीता 9.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।