भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.5 · न च मत्स्थानि भूतानि मे
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
na ca matsthāni bhūtāni paśya me yogamaiśvaram |
bhūtabhṛnna ca bhūtastho mamātmā bhūtabhāvanaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
और फिर भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं — मेरे इस ईश्वरीय योग को देखो! मेरा स्वरूप सब प्राणियों को उत्पन्न करता है और उनका पालन करता है, फिर भी उनमें नहीं रहता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.5 का अर्थ क्या है?
और फिर भी प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं — मेरे इस ईश्वरीय योग को देखो! मेरा स्वरूप सब प्राणियों को उत्पन्न करता है और उनका पालन करता है, फिर भी उनमें नहीं रहता।
भगवद्गीता 9.5 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।