भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 7 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.7 · यदा यदा हि धर्मस्य भारत
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata |
abhyutthānamadharmasya tadātmānaṃ sṛjāmyaham ||
हिन्दी अनुवाद
हे भारत, जब कभी धर्म क्षीण होने लगता है और अधर्म सिर उठाता है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.7 का अर्थ क्या है?
हे भारत, जब कभी धर्म क्षीण होने लगता है और अधर्म सिर उठाता है, तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
भगवद्गीता 4.7 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।