भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.6 · अजोऽपि सन्नव्ययात्मा सन्
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥
ajo’pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro’pi san |
prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā ||
हिन्दी अनुवाद
अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी, सब प्राणियों का स्वामी होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन रखकर अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.6 का अर्थ क्या है?
अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी, सब प्राणियों का स्वामी होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन रखकर अपनी माया से प्रकट होता हूँ।
भगवद्गीता 4.6 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।