भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.8 · परित्राणाय साधूनां च

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām |
dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||

हिन्दी अनुवाद

सज्जनों की रक्षा, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.8 का अर्थ क्या है?

सज्जनों की रक्षा, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

भगवद्गीता 4.8 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।