भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 37 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 4.37 · यथैधांसि
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
yathaidhāṃsi samiddho’gnirbhasmasātkurute’rjuna |
jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurute tathā ||
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन, जैसे धधकती आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को राख कर देती है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 4.37 का अर्थ क्या है?
हे अर्जुन, जैसे धधकती आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को राख कर देती है।
भगवद्गीता 4.37 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।