भगवद्गीता · अध्याय 4, श्लोक 38 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 4.38 · न हि ज्ञानेन सदृशं

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate |
tatsvayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati ||

हिन्दी अनुवाद

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 4.38 का अर्थ क्या है?

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है।

भगवद्गीता 4.38 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (ज्ञान-कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।