भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.5 · न हि कश्चित्क्षणमपि जातु

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥

na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt |
kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ||

हिन्दी अनुवाद

कोई भी क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी को, चाहे वह चाहे या न चाहे, कर्म करने को विवश करते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.5 का अर्थ क्या है?

कोई भी क्षण भर के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता; प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी को, चाहे वह चाहे या न चाहे, कर्म करने को विवश करते हैं।

भगवद्गीता 3.5 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।