भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.6 · कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ||

हिन्दी अनुवाद

जो कर्मेन्द्रियों को रोककर बैठ जाता है, पर मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ है और पाखंडी कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.6 का अर्थ क्या है?

जो कर्मेन्द्रियों को रोककर बैठ जाता है, पर मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह मूढ़ है और पाखंडी कहलाता है।

भगवद्गीता 3.6 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।