भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.4 · न पुरुषोऽश्नुते

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥

na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo’śnute |
na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati ||

हिन्दी अनुवाद

कर्मों का आरंभ न करने से मनुष्य कर्म से मुक्ति (निष्कर्मता) नहीं पाता, और केवल संन्यास ले लेने से भी सिद्धि नहीं मिलती।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.4 का अर्थ क्या है?

कर्मों का आरंभ न करने से मनुष्य कर्म से मुक्ति (निष्कर्मता) नहीं पाता, और केवल संन्यास ले लेने से भी सिद्धि नहीं मिलती।

भगवद्गीता 3.4 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।