भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 41 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.41 · तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha |
pāpmānaṃ prajahi hyenaṃ jñānavijñānanāśanam ||
हिन्दी अनुवाद
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, पहले इन्द्रियों को वश में करो और ज्ञान तथा विज्ञान (अनुभव) का नाश करने वाले इस पापी को निश्चय ही मार डालो।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.41 का अर्थ क्या है?
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, पहले इन्द्रियों को वश में करो और ज्ञान तथा विज्ञान (अनुभव) का नाश करने वाले इस पापी को निश्चय ही मार डालो।
भगवद्गीता 3.41 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।