भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 40 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 3.40 · इन्द्रियाणि मनो

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥

indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate |
etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||

हिन्दी अनुवाद

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास-स्थान कहे जाते हैं। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित कर देता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 3.40 का अर्थ क्या है?

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास-स्थान कहे जाते हैं। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी को मोहित कर देता है।

भगवद्गीता 3.40 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।