भगवद्गीता · अध्याय 3, श्लोक 3 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 3.3 · लोकेऽस्मिन्द्विविधा पुरा
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥
loke’smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha |
jñānayogena sāṃkhyānāṃ karmayogena yoginām ||
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान बोले: हे निष्पाप, इस संसार में मैंने पहले से दो प्रकार की निष्ठा बताई है — चिंतनशील लोगों के लिए ज्ञानयोग (सांख्य) और कर्मशील लोगों के लिए कर्मयोग।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है। इस अध्याय में 43 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 3.3 का अर्थ क्या है?
श्रीभगवान बोले: हे निष्पाप, इस संसार में मैंने पहले से दो प्रकार की निष्ठा बताई है — चिंतनशील लोगों के लिए ज्ञानयोग (सांख्य) और कर्मशील लोगों के लिए कर्मयोग।
भगवद्गीता 3.3 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 3, कर्मयोग (कर्म योग — कर्म का योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।